Rudra Stavanam in Hindi
यह “श्री रुद्र स्तवनम्” आदि शंकराचार्य द्वारा प्रपञ्चसार ग्रंथ में रचित एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। इसमें भगवान रुद्र (भगवान शिव) की महिमा, स्वरूप और उनके ब्रह्मांडीय कार्यों की प्रशंसा की गई है। इस स्तोत्र में शिव को परमात्मा कहा गया है — जो ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूप में सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं। वे सर्वव्यापक चेतना हैं जो संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं।
इसमें भगवान शिव के नीलकंठ रूप की स्तुति की गई है, जिन्होंने समुद्र मंथन के समय विष का पान करके संसार को विनाश से बचाया। यह उनकी करुणा, त्याग और रक्षक रूप को दर्शाता है। शिव को यहाँ योगियों के ईश्वर, ज्ञान के प्रतीक, तथा भक्तों को भक्ति और मोक्ष दोनों देने वाले कहा गया है।
श्री रुद्र स्तवनम् यह भी बताता है कि शिव ही शक्ति (पार्वती) के साथ एकात्म हैं — जो अर्धनारीश्वर स्वरूप में सृष्टि के संतुलन का प्रतीक हैं। वे समय, अहंकार और अज्ञान का नाश करते हैं और जीव को भवभय (संसार के बंधनों) से मुक्त करते हैं।
संक्षेप में, यह स्तोत्र भगवान शिव के उस परम, सर्वशक्तिमान और करुणामय रूप का वर्णन करता है जो सृष्टि के मूल में हैं और जो अपने भक्तों को शांति, सुख और मोक्ष प्रदान करते हैं।
श्री रुद्र स्तवनम्
नमो विरिञ्चविष्ण्वीशभेदेन परमात्मने ।
सर्गसंस्थितिसंहारव्यावृत्तिव्यक्तवृत्तये ॥ 1 ॥
नमश्चतुर्धा प्रोद्भूतभूतभूतात्मने भुवः ।
भूरिभारार्तिसंहर्त्रे भूतनाथाय शूलिने ॥ 2 ॥
विश्वग्रासाय विलसत्कालकूटविषाशिने ।
तत्कलङ्काङ्कितग्रीवनीलकण्ठाय ते नमः ॥ 3 ॥
नमो ललाटनयनप्रोल्लसत्कृष्णवर्त्मने ।
ध्वस्तस्मरनिरस्ताधियोगिध्याताय शम्भवे ॥ 4 ॥
नमो देहार्धकान्ताय दग्धदक्षाध्वराय च ।
चतुर्वर्गेष्वभीष्टार्थदायिने मायिनेऽणवे ॥ 5 ॥
स्थूलाय मूलभूताय शूलदारितविद्विषे ।
कालहन्त्रे नमश्चन्द्रखण्डमण्डितमौलये ॥ 6 ॥
विवाससे कपर्दान्तर्भ्रान्ताहिसरिदिन्दवे ।
देवदैत्यासुरेन्द्राणां मौलिघृष्टाङ्घ्रये नमः ॥ 7 ॥
भस्माभ्यक्ताय भक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने ।
व्यक्ताव्यक्तस्वरूपाय शङ्कराय नमो नमः ॥ 8 ॥
नमोऽन्धकान्तकरिपवे पुरद्विषे
नमोऽस्तु ते द्विरदवराहभेदिने ।
विषोल्लसत्फणिकुलबद्धमूर्तये
नमः सदा वृषवरवाहनाय ते ॥ 9 ॥
वियन्मरुद्धुतवहवार्वसुन्धरा
मखेशरव्यमृतमयूखमूर्तये ।
नमः सदा नरकभयावभेदिने
भवेह नो भवभयभङ्गकृद्विभो ॥ 10 ॥
इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रपञ्चसारे पञ्चविंशः पटले श्री रुद्र स्तवनम् ॥
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