Dakshinamurthy Dandakam in Hindi

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Dakshinamurthy Dandakam in Hindi

भगवान दक्षिणामूर्ति भगवान शिव का एक अत्यंत अद्भुत और ज्ञानमय रूप हैं। यह स्वरूप ज्ञान, मौन उपदेश, आत्मसाक्षात्कार और अध्यात्मिक ज्ञान के अधिपति के रूप में पूजित हैं।
दक्षिणामूर्ति दण्डकम” एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान के इस रूप की महिमा का गान करता है। इसमें भगवान को कैवल्य (मोक्ष), ज्ञान, भक्ति, और योग के दाता के रूप में वर्णित किया गया है।

दक्षिणामूर्ति दण्डकम का अर्थ और भावार्थ

श्लोक का प्रारंभ इस मंत्र से होता है —

ॐ नमस्ते दक्षिणामूर्तये स्वस्वरूपाय कैवल्यरूपिणे…

इसमें भक्त भगवान को बार-बार नमस्कार करता है, और उनके विविध दिव्य गुणों की स्तुति करता है। नीचे प्रमुख भावार्थ दिए गए हैं:

कैवल्यरूपिणे नमः

भगवान दक्षिणामूर्ति ही कैवल्य (मोक्ष) के स्वरूप हैं। वे न केवल मुक्ति के दाता हैं, बल्कि स्वयं मुक्ति के प्रतीक हैं।

 मुक्तिहेतवे मुक्तिदायिने नमः

वे ही वह कारण हैं जिनसे आत्मा बंधन से मुक्त होती है। साधक को वे मुक्ति का वरदान देते हैं।

तपःस्वरूपिणे परमतपस्विने नमः

भगवान स्वयं तपस्वी हैं, और सच्चे तपस्वियों के ईश्वर हैं। उनका जीवन तप, संयम और आत्मज्ञान का प्रतीक है।

 ब्रह्मविद्योपदेशकर्त्रे नमः

वे ही ब्रह्मविद्या (आत्मज्ञान) का उपदेश देने वाले परम गुरु हैं। उनका उपदेश शब्दों से नहीं, बल्कि मौन से होता है — जिसे “मौनम व्याख्या” कहा गया है।

भक्तिहेतवे भक्तिदायिने नमः

वे ही भक्ति के कारण, भक्ति के दाता, और भक्तों के रक्षक हैं। उनका हृदय भक्तों के प्रति असीम करुणा से भरा है।

 योगीश्वराय नमः

भगवान दक्षिणामूर्ति योग के स्वामी, योगियों के ईश्वर, और परम योगी हैं। वे साधक को आत्मसंयम और समाधि की दिशा में प्रेरित करते हैं।

सर्वेश्वराय नमः

वे ही संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी, सर्वलोकाधिपति, और सर्वविद्याओं के अधिपति हैं।

श्री दक्षिणामूर्ति दण्डकम्

ओं नमस्ते दक्षिणामूर्तये स्वस्वरूपाय कैवल्यरूपिणे कैवल्यहेतवे कैवल्यपतये नमो नमो मुक्तिरूपिणे मुक्तिहेतवे मुक्तिदायिने मुक्तानां पतये नमो नमो तपः स्वरूपिणे परमतपस्विने तपस्वीनां पतये नमो नमो ब्रह्मविद्योपदेशकर्त्रे ब्रह्मविद्याहेतवे गुरूणां गुरवे नमो नमो विरक्तिहेतवे विरक्तिरूपिणे विरक्ताय विरक्तानां पतये नमो नमो यतिबृन्दसमावृताय यतिधर्मपरायणाय यतिरूपधारिणे यतिप्रियाय यतीश्वराय नमो नमो सुज्ञानहेतवे सुज्ञानदायिने ज्ञानरूपाय ज्ञानदीपाय ज्ञानेश्वराय नमो नमो भक्तिहेतवे भक्तिदायिने भक्तवत्सलाय भक्तपराधीनाय भक्तानां पतये नमो नमो योगारूढाय योगाय परमयोगिने योगीश्वराय नमो नमो देवानां पतये सर्वविद्याधिपतये सर्वेश्वराय सर्वलोकाधिपतये सर्वभूताधिपतये नमो नमः स्वात्मरूपाय स्वात्ममूर्तये स्वात्मानन्ददायिने स्वस्वरूपाय नमो नमो परमात्मने परञ्ज्योतिषे परन्धामय परमगतये परब्रह्मणे नमो नमः ॥

आध्यात्मिक संदेश

यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है।
भगवान दक्षिणामूर्ति हमें यह स्मरण कराते हैं कि —

“जो स्वयं को जान लेता है, वही परमात्मा को जान लेता है।”

मौन ही उनका उपदेश है — मौनं व्याख्या प्रमाणं।
अर्थात्, जब मन शांत होता है, तब आत्मा स्वयं प्रकट होती है।

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